
शुन्य हर तरफ
ना कोई उमंग, ना कोई सपना,
कुछ अन्दर है जो दम तोड़ता जा रहा है,
मरने से रोकना है उसे,
पर जैसे उसकी धीमी होती सासें , महसूस करती हूँ I
यह कैसी घुटन है ?कैसी तलाश ?
इतना गैराना अपने ही अस्तित्व से ?
क्यूँ फडफडाते हैं मनं के पंख,
क्यूँ सब कुछ निकलता जा रहा है ,और मैं रोक नहीं पा रही उसे?
तम्मन्ना आकाश छूने की ,
हिम्मत चट्टान हिलाने की ,
पर जैसे ज्वालामुखी का यह मलवा अन्दर ही ठंडा पड़ता जा रहा है II
किन बंधनों से बंधी हूँ ,जिन्हें तोड़ने मैं असक्षम मैं?
पर यह बंधन ही तो मानव होने का गौरव दिलाते हैं ,
कभी मेरी कमजोरी तो कभी मेरी शक्ति बताते हैं II
डरती हूँ, आकाश की खोज मैं निकली मैं ,
कहीं धरती से वास्ता खो बेठी ,
तो धरातल पर आ गिरूंगी II
समय बीतता जा रहा है, झटपताहट बढती जा रही है ,
और जैसे बुझते दिए की लौ तेज़ हो जाती है,
मनं की तीव्रता भी बढती है II
शक्ति है मझमें,
अभिलाषा भी,
उसे दीप्त करने वाला पुरुषार्थ भी I
आकाश मुझसे मिलने धरती तक आएगा I
मैं यहीं धरातल पर रह कर चट्टान हिलाउंगी ,
अपना आकाश स्वयं बनाउंगी !!.